लोकायुक्त जांच में आरडीयू की किरकिरी: खाली हाथ पेश हुए अफसर, अब 19 जनवरी की निर्णायक पेशी

 


जबलपुर |रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय (आरडीयू) में श्रमसाध्य भत्ता भुगतान को लेकर चल रही लोकायुक्त जांच ने अब गंभीर रूप ले लिया है। कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच कर रही मध्यप्रदेश लोकायुक्त टीम के समक्ष विश्वविद्यालय के अधिकारी बिना जरूरी दस्तावेजों के ही पेश हो गए, जिस पर जांच अधिकारी ने कड़ी नाराज़गी जताते हुए अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई। लोकायुक्त ने अब सख्त रुख अपनाते हुए विश्वविद्यालय प्रबंधन को 19 जनवरी तक का अंतिम अवसर देते हुए सभी संबंधित अभिलेखों के साथ उपस्थित होने का निर्देश जारी कर दिया है।

दस्तावेज जुटाने के नाम पर मांगा एक माह का वक्त

जानकारी के अनुसार, लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक ने इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच के लिए एक महिला अधिकारी को अधिकृत किया है। पूर्व में जारी नोटिस के तहत आरडीयू के लेखा एवं स्थापना विभाग के अधिकारियों को लोकायुक्त कार्यालय तलब किया गया था। अधिकारी उपस्थित तो हुए, लेकिन उनके पास मांगे गए अनिवार्य दस्तावेज मौजूद नहीं थे।
पूछताछ के दौरान अधिकारियों ने दलील दी कि दस्तावेजों का संकलन किया जा रहा है, जिसमें करीब एक माह का समय लगेगा। जांच अधिकारी ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए दो टूक कहा कि 19 जनवरी तक हर हाल में पूरा रिकॉर्ड पेश करना होगा, अन्यथा सख्त कार्रवाई की जाएगी।

करोड़ों के वित्तीय नुकसान की आशंका

यह पूरा मामला विश्वविद्यालय के तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को दिए गए श्रमसाध्य भत्ते से जुड़ा है। आरोप है कि जनवरी 2024 से अक्टूबर 2024 के बीच शासन के निर्देशों और तय नियमों की अनदेखी करते हुए बड़े पैमाने पर भुगतान कर दिया गया। शिकायत में कहा गया है कि

  • न तो किसी वास्तविक अतिरिक्त कार्य का सत्यापन किया गया

  • न ही पात्रता की विधिवत जांच हुई
    इसके बावजूद भत्ता वितरित कर दिया गया, जिससे विश्वविद्यालय को लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक की वित्तीय क्षति पहुंचने की आशंका है।

19 जनवरी की पेशी पर टिकी निगाहें

लोकायुक्त की जांच अब इस अहम सवाल पर केंद्रित है कि—

  • भत्ता भुगतान के आदेश किस आधार पर जारी हुए

  • किन-किन कर्मचारियों को कितनी राशि दी गई

  • क्या अतिरिक्त कार्य से संबंधित कोई सत्यापित रजिस्टर या पंजी संधारित की गई

प्रारंभिक जांच में रिकॉर्ड के अभाव के संकेत मिले हैं, जिससे विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई है। 19 जनवरी की पेशी को निर्णायक माना जा रहा है, जहां आरडीयू प्रबंधन की जवाबदेही तय हो सकती है और आगे की कार्रवाई की दिशा स्पष्ट होगी।

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