जबलपुर। जबलपुर स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल परिसर में एम्बुलेंस माफिया की मनमानी थमने का नाम नहीं ले रही है। जिला प्रशासन, पुलिस और मेडिकल प्रबंधन द्वारा समय-समय पर की गई कार्रवाइयों के बावजूद निजी एम्बुलेंस चालकों की गुंडागर्दी और अवैध वसूली बदस्तूर जारी है। हालात यह हैं कि मरीजों के अटेंडर खुद को असहाय और लुटा हुआ महसूस कर रहे हैं।
कागजों में निजी एम्बुलेंसों को अस्पताल परिसर से बाहर रखने के निर्देश हैं, लेकिन हकीकत में माफिया से जुड़े लोग वार्डों तक सक्रिय नजर आते हैं। कई मामलों में परिजनों से अभद्रता और मारपीट की शिकायतें सामने आई हैं। दबाव बनाकर, डराकर और जबरन अपनी एम्बुलेंस से मरीज ले जाने के लिए मजबूर करना अब आम बात हो गई है।
मेडिकल मेट्रो बस स्टॉप के पास जमाया डेरा
कार्रवाई से बचने के लिए दिन में निजी एम्बुलेंस चालक परिसर से दूर रहते हैं, लेकिन शाम ढलते ही मेडिकल कॉलेज के आसपास—खासकर मेडिकल मेट्रो बस स्टॉप के पास और सड़क के दोनों ओर—एम्बुलेंसों की कतार लग जाती है। यहीं से मरीजों के परिजनों को निशाना बनाकर खुलेआम वसूली की जाती है।
सरकारी एम्बुलेंस की कमी का उठाया जा रहा फायदा
परिजनों का आरोप है कि सरकारी एम्बुलेंस उपलब्ध न होने का फायदा उठाकर निजी चालक मनमाना किराया वसूलते हैं। मजबूरी में लोग उनकी शर्तें मानने को विवश हो जाते हैं।
किराए के नाम पर खुली लूट
शहर के निजी अस्पतालों तक मरीज पहुंचाने के लिए 3,000 से 4,500 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। इससे कम में कोई एम्बुलेंस जाने को तैयार नहीं। वहीं नागपुर जैसे बाहरी शहरों के लिए छोटी वैन एम्बुलेंस का किराया 12,000 रुपये और बड़ी एम्बुलेंस के लिए 22,000 रुपये तक लिया जा रहा है—बिना तय सरकारी दरों और किसी प्रभावी निगरानी के।
कमीशन के खेल में मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़
सूत्रों के मुताबिक, निजी अस्पतालों से मिलने वाले भारी कमीशन के लालच में एम्बुलेंस माफिया मरीजों की जिंदगी से खेल रहा है। सरकारी अस्पताल से निजी अस्पतालों में शिफ्टिंग में दलालों की अहम भूमिका रहती है, बदले में मोटा कमीशन मिलता है। पहले भी ऐसे मामले उजागर हो चुके हैं, लेकिन ठोस कार्रवाई न होने से यह सिंडिकेट और मजबूत होता जा रहा है।
मानकों पर खरी नहीं उतरतीं निजी एम्बुलेंस
सबसे गंभीर चिंता यह है कि शहर की अधिकांश निजी एम्बुलेंस स्वास्थ्य विभाग के तय मानकों पर खरी नहीं उतरतीं। कई में ऑक्सीजन के अलावा बेसिक लाइफ सपोर्ट सुविधाएं तक नहीं हैं। एडवांस लाइफ सपोर्ट बताई जाने वाली एम्बुलेंसों में भी प्रशिक्षित EMT या पैरामेडिक्स की कमी है। कुछ एम्बुलेंस खुद जर्जर हालत में चल रही हैं, जिससे मरीजों की जान पर खतरा और बढ़ जाता है।
रेट निर्धारण और सख्त निगरानी जरूरी
स्वास्थ्य विभाग के निर्देशों के बावजूद अब तक प्रभावी दर निर्धारण नहीं हो सका है। जानकारों का कहना है कि जब तक किराए तय नहीं होंगे और मेडिकल कॉलेज परिसर में सख्त, सतत निगरानी नहीं होगी, तब तक एम्बुलेंस माफिया पर लगाम लगना मुश्किल है।
मरीजों के परिजन मांग कर रहे हैं कि प्रशासन केवल कार्रवाई का दिखावा न करे, बल्कि पूरे सिंडिकेट को तोड़ने के लिए ठोस और स्थायी कदम उठाए, ताकि इलाज के लिए आए लोगों को लूट और डर के साये में न जीना पड़े।
