तीन साल से दबा है आशा प्रोत्साहन राशि घोटाले का जांच प्रतिवेदन, एसीएस के हस्तक्षेप के बाद बढ़ी स्वास्थ्य अधिकारियों की बेचैनी

 



जबलपुर। जिले के स्वास्थ्य विभाग में वित्तीय अनियमितताओं और लंबित जांचों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि विभाग में वर्षों से ऐसी व्यवस्था बनी हुई है, जिसमें शासकीय योजनाओं में गड़बड़ियों की जांच उन्हीं अधिकारियों को सौंप दी जाती है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मामलों से जुड़े होते हैं। परिणामस्वरूप जांच प्रतिवेदन फाइलों में ही दबकर रह जाते हैं और दोषियों पर कार्रवाई नहीं हो पाती।

ऐसा ही एक मामला वर्ष 2022 में आशा प्रोत्साहन राशि वितरण में हुई कथित अनियमितताओं का है। जानकारी के अनुसार आशा कार्यकर्ताओं को दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि के भुगतान में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आई थी। कुछ आशा कार्यकर्ताओं के खातों में 45-45 हजार रुपये तक जमा कर दिए गए थे, जबकि एक मृत आशा कार्यकर्ता के खाते में भी राशि ट्रांसफर किए जाने का मामला उजागर हुआ था।

मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच समिति गठित कर दोषियों की पहचान करने की प्रक्रिया शुरू की और इसकी जानकारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) मुख्यालय को भी भेजी गई। प्रारंभिक स्तर पर बयान लिए गए, नोटिस जारी किए गए, लेकिन जांच केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रह गई। तीन वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद जांच प्रतिवेदन अब तक सार्वजनिक नहीं हो सका है।

सूत्रों के अनुसार इस मामले में कई वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ रही थी, विशेषकर वे अधिकारी जिनकी लॉगिन आईडी से पोर्टल पर डेटा अपलोड और भुगतान की प्रक्रिया संचालित होती थी। इसी कारण जांच आगे नहीं बढ़ सकी और फाइलें लंबित होती चली गईं।

बताया जाता है कि चूंकि यह राशि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत जारी हुई थी, इसलिए मिशन संचालक द्वारा लगातार जांच रिपोर्ट और दोषियों पर की गई कार्रवाई का प्रतिवेदन मांगा जा रहा है। सूत्रों का दावा है कि एनएचएम द्वारा एक दर्जन से अधिक रिमाइंडर पत्र भेजे जा चुके हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर अब तक संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया है।

विधानसभा तक पहुंचा मामला

आशा प्रोत्साहन राशि अनियमितता का मुद्दा विधानसभा में भी उठ चुका है, इसके बावजूद जांच प्रतिवेदन मुख्यालय नहीं भेजा गया। इससे भोपाल स्तर के अधिकारियों में नाराजगी बताई जा रही है। वहीं स्थानीय अधिकारी मामले को पुराना बताकर जवाबदेही से बचते नजर आ रहे हैं।

हाल ही में संजीवनी क्लीनिकों के लिए प्राप्त 58 लाख रुपये के उपयोग और उससे संबंधित पत्राचार के मामले में भी स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठे हैं। आरोप है कि एनएचएम के पत्रों का जवाब देने में भी अनावश्यक विलंब किया जा रहा है।

एसीएस ने लिया संज्ञान, कलेक्टर को दिए निर्देश

मामले की गंभीरता को देखते हुए अपर मुख्य सचिव (एसीएस) अशोक बर्णवाल ने जांच प्रतिवेदन लंबित रहने को गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना है। सूत्रों के अनुसार हाल ही में विक्टोरिया अस्पताल परिसर में निर्माणाधीन भवन के निरीक्षण के दौरान उन्होंने संबंधित अधिकारियों को सख्त निर्देश भी दिए थे।

जानकारी के मुताबिक एसीएस ने अब जबलपुर कलेक्टर को पूरे मामले की पड़ताल कर जांच प्रतिवेदन शीघ्र मुख्यालय भेजने के निर्देश दिए हैं। कलेक्टर राघवेंद्र सिंह की सक्रियता के बाद स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों में हलचल बढ़ गई है।

कलेक्टर राघवेंद्र सिंह ने बताया कि उन्हें इस संबंध में रिमाइंडर पत्र प्राप्त हुआ है और पत्र के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जा रही है।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि वर्षों से लंबित जांच आखिर कब पूरी होती है और क्या वित्तीय अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई हो पाती है या नहीं।

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