एक-दो नहीं, 100 बच्चों ने पेरेंट्स को लेकर कीं यही 2 शिकायतें, सुनकर एक्सपर्ट बोलीं-प्लीज उन्हें समझिए

 


आमतौर पर बच्चों और माता-पिता, दोनों को ही कभी-कभी एक-दूसरे से कुछ बातों को लेकर नाराजगी या शिकायतें रहती हैं। कई बार ये शिकायतें आपसी बातचीत से दूर हो जाती हैं, लेकिन कुछ मामलों में बच्चों या पेरेंट्स को प्रोफेशनल मदद की जरूरत भी पड़ती है। ऐसे ही एक अनुभव को साझा करते हुए साइकोलॉजिस्ट कोमल बक्शी ने बताया कि उन्होंने 100 अलग-अलग बच्चों से बात सुनी है। हैरानी की बात यह रही कि इनमें से ज्यादातर बच्चों की 2 शिकायतें बिल्कुल एक जैसी थीं। इन बातों को सुनने के बाद उन्होंने सभी माता-पिता से अपील की कि वे अपने बच्चों को समझने की कोशिश करें, क्योंकि कई बच्चे ऐसे वक्‍त में बहुत ज्‍यादा दर्द में होते हैं।

साइकोलॉजिस्ट कोमल बक्शी कहती हैं, ‘मैं दिन भर में करीब 100 बच्चों के मैसेज पढ़ती हूं। उन सभी बच्चों की एक कॉमन प्रॉब्लम होती है। वे कहते हैं, 'मेरे पेरेंट्स मेरी केयर नहीं करते' या 'मेरी बात नहीं समझते।' अब इतने सारे बच्चों को एक साथ एक जैसी समस्या कैसे हो सकती है?’

वे आगे कहती हैं, ‘इसका मतलब साफ है न कि पेरेंटिंग में कहीं न कहीं कुछ कमी रह जा रही है। अब माता-पिता को यह समझना और स्वीकार करना होगा कि आज की जेनरेशन पहले की किसी भी जेनरेशन से अलग है। इसकी तुलना पुरानी पीढ़ियों से नहीं की जा सकती। इस पीढ़ी को जो कुछ सुव‍िधाएं भी म‍िली हैं, उसमें उनकी कोई गलती नहीं है। ऐसे में पेरेंट्स को ज्यादा धैर्य और समझदारी दिखानी होगी। उन्हें बच्चों को समझने की पूरी कोशिश करनी होगी।’

कोमल बक्शी कहती हैं, ‘पेरेंट्स को यह समझना चाहिए कि जब बच्चे कहते हैं, 'मुझे कोई नहीं समझता', तब वे अंदर से बहुत दर्द में होते हैं। वे भी चाहते हैं कि आपकी बात मानें, आपके साथ एडजस्ट करें, लेकिन आज के समय में डिस्ट्रैक्शन इतने ज्यादा हैं कि वे फोकस नहीं कर पाते। इसलिए यहां पेरेंट्स को समझदारी दिखानी होगी। उन्हें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि माता-पिता हमेशा पूरी तरह सही नहीं होते और न ही बच्चे हमेशा पूरी तरह गलत होते हैं।’

साइकोलॉजिस्ट अंत में कहती हैं, ‘इसीलिए बीच का रास्ता निकालना जरूरी है। इस पीढ़ी को समझने और उन्हें सपोर्ट करने के तरीके बदलने होंगे। ब्लेम गेम खेलने के बजाय पेरेंट्स को अपनी भाषा और बात करने के तरीके पर काम करना चाहिए। बच्चों के साथ बैठें, उनसे बातचीत करें और उनके साथ मजबूत कनेक्शन बनाएं। वरना इसका नुकसान माता-पिता और बच्चों, दोनों को उठाना पड़ेगा। इसलिए पेरेंट्स के लिए यह बात समझना बेहद जरूरी है।’

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