कैसे दान से खुलता है सौभाग्य का द्वार, क्यों जरूरी है दान और पुण्य

 



दान करते ही दुर्भाग्य की नकारात्मकता धीरे-धीरे जीवन से बाहर होने लगती है और उसके स्थान पर सौभाग्य का प्रवेश हो जाता है। यह प्रक्रिया किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि ऊर्जा के रूपांतरण से घटित होती है।
सम्पन्न होने पर अपनी आय का कुछ प्रतिशत अवश्य ही दान, पुण्य कर्म में लगाना चाहिए, ऐसा करने से जीवन में कभी भी हारी-बीमारी, दुःख-संकट एकत्र नहीं हो पाते। जब हम किसी वस्तु का दान करते हैं, तो मन में विरक्ति का भाव आता है, दुर्भाग्य का दान करेंगे, तो सौभाग्य निश्चित ही आएगा।
दान करने से दुर्भाग्य दूर होता है और जैसे ही दुर्भाग्य जाता है, सौभाग्य आ जाता है। इसे इस प्रकार समझिए कि जैसे आपके पास एक पात्र है, उसमें कुछ भरा हुआ है, जब तक उसमें से कुछ खाली नहीं करेंगे, तब तक उसमें दूसरी चीज नहीं आ सकती है। इसी प्रकार से जो लोग सम्पन्न होने के बावजूद दान आदि देने से कतराते हैं अथवा मन के गरीब होते हैं, वे बहुत ज्यादा प्रगति नहीं कर पाते हैं, क्योंकि अध्यात्मिक नियम यह कहता है कि चाहें कुछ भी हो जाए, व्यक्ति मन का गरीब नहीं होना चाहिए।
जब आप किसी वस्तु का दान करते हैं, तो मन में विरक्ति का भाव आता है, जब आप दान करेंगे तो दुर्भाग्य आपका दूर हो जाएगा और बदले में सौभाग्य चला आएगा। यह एक प्रकार से उर्जा का रूपांतरण है, दुःख भरी उर्जा बाहर निकालने से उसके रिक्त स्थान पर सकारात्मक सुख भरी उर्जा समाहित होने लगती है। जन्म राशि का स्वामी किसी भी व्यक्ति के उत्थान-पतन में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अतः राशि अनुसार वस्तुओं का दान विशिष्ट पर्वों पर अवश्य करते रहना चाहिए। राजा हर्षवर्धन का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि दान से कभी कमी नहीं आती। उन्होंने बार-बार अपना सर्वस्व दान किया, फिर भी उनका यश, वैभव और प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ती गई, क्योंकि जहाँ मन उदार होता है, वहाँ सौभाग्य स्वयं निवास करने आता है।
जब व्यक्ति कुछ देता है, तो उसके भीतर यह भाव जागृत होता है कि “मेरे पास देने योग्य है।” यही भाव अभाव-बोध को समाप्त कर देता है। अभाव की भावना ही दुर्भाग्य का मूल कारण होती है, जबकि संतोष और उदारता सौभाग्य को आकर्षित करते हैं। अध्यात्म कहता है कि जीवन एक निरंतर प्रवाह है। दान करने से चित्त शुद्ध होता है और कर्मों का भार कम होने लगता है। यही कारण है कि दान करने वाले व्यक्ति के जीवन में अनजाने ही नए अवसर, सहायता और अनुकूल परिस्थितियाँ बनने लगती हैं।

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