14 अप्रैल 2008 की वो रात अमरोहा के बावनखेड़ी गांव के लिए किसी कयामत से कम नहीं थी। आधी रात का सन्नाटा पसरा हुआ था, तभी करीब 2 बजे एक चीख ने पूरे गांव की नींद उड़ा दी। गांव वाले मास्टर शौकत अली के घर की तरफ दौड़े। देखा तो उनकी बेटी शबनम बालकनी में खड़ी दहाड़ें मारकर रो रही थी।
वह बार-बार कह रही थी कि बचा लो, वो मुझे भी मार डालेंगे। पड़ोसियों ने बाउंड्री फांदकर घर का दरवाजा खुलवाया। जैसे ही लोग छत पर पहुंचे, मंजर देखकर कलेजा मुंह को आ गया। मास्टर शौकत अली की सिर कटी लाश चारपाई पर खून से लथपथ पड़ी थी। घर के हर कोने में लाशें बिछी थीं।
अमरोहा के बावनखेड़ी के शौकत एक कालेज में प्रवक्ता थे। परिवार में पत्नी के अलावा 3 बच्चे थे। दो बेटे- अनीस और राशिद तथा एक बेटी शबनम। एक बेटा एमबीए पास था और दूसरा इंजीनियर। घर की बड़ी बेटी शबनम इंग्लिश और भूगोल में डबल एमए थी। साथ ही वह एक स्कूल में शिक्षामित्र भी थी। पूरा घर बहुत पढ़ा लिखा था इसलिए गांव में काफी इज्जत थी।
मकान में कमरों में मिली लाशें
मगर उसी रात शौकत के एक पड़ोसी ने पुलिस को फोन कर बताया कि उनके घर में बड़ा हादसा हो गया है। पुलिस टीम जब मौके पर पहुंची और घर में दाखिल हुई तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। मकान के चार अलग-अलग कमरों में शौकत, उनकी पत्नी, दोनों बेटों, बहू और दो बच्चों की लाशें पड़ी थीं। 11 महीने के बच्चे को छोड़ बाकी सभी का गला कटा हुआ था और पूरा घर खून से सना था। परिवार में सिर्फ शबनम ही जिंदा मिली, जो घर के एक कोने में दहाड़ मारकर रो रही थी। उस रात का यह खौफनाक मंजर इंस्पेक्टर आरपी गुप्ता ने अपनी आंखों से देखा था।