भोपाल। विश्व तंबाकू निषेध दिवस (31 मई) के अवसर पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने देश में युवाओं के बीच तेजी से बढ़ रहे तंबाकू सेवन और उससे उत्पन्न हो रहे कैंसर के मामलों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। विशेषज्ञों का कहना है कि गुटखा, तंबाकू और अन्य निकोटिन उत्पादों की बढ़ती लत अब एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है, जिसका प्रभाव आने वाले वर्षों में और अधिक गंभीर रूप में सामने आ सकता है।
जानकारी के अनुसार, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) की कैंसर एंड टोबैको कंट्रोल कमेटी के विशेषज्ञों का मानना है कि पुरुषों में पाए जाने वाले कुल कैंसर मामलों में लगभग 54 प्रतिशत कैंसर सीधे तौर पर तंबाकू सेवन से जुड़े होते हैं। वहीं महिलाओं में यह आंकड़ा 17 से 18 प्रतिशत के बीच है। यह स्थिति स्वास्थ्य व्यवस्था और समाज दोनों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।
कम उम्र में बढ़ रहे मुंह के कैंसर के मामले
कैंसर एंड टोबैको कंट्रोल कमेटी, आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दिलीप कुमार आचार्य ने बताया कि पहले तंबाकू सेवन से संबंधित कैंसर के मामले आमतौर पर 60 वर्ष की आयु के बाद सामने आते थे, लेकिन अब 25 से 40 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में भी मुंह के कैंसर के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि कम उम्र में गुटखा और तंबाकू सेवन की शुरुआत, तंबाकू उत्पादों में मौजूद कैंसरकारी रसायनों की बढ़ती मात्रा और युवाओं की कमजोर होती प्रतिरोधक क्षमता इसके प्रमुख कारण हैं। डॉ. आचार्य के अनुसार निकोटिन अत्यधिक नशे की लत पैदा करने वाला पदार्थ है और इसकी आदत लगने के बाद इससे छुटकारा पाना बेहद कठिन हो जाता है।
युवतियों में भी बढ़ रही निकोटिन उत्पादों की लत
विशेषज्ञों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि हाल के वर्षों में कॉलेज जाने वाली युवतियों के बीच भी तंबाकू और निकोटिन उत्पादों के उपयोग की प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई दे रही है। हालांकि इसके सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन चिकित्सकीय अनुभवों में इस बदलाव को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा रहा है।
डॉ. आचार्य ने बताया कि महिलाओं में तंबाकू सेवन के कारण मासिक धर्म संबंधी समस्याएं, गर्भपात का खतरा, गर्भावस्था में जटिलताएं और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई गर्भवती महिला तंबाकू का सेवन करती है तो इसका प्रतिकूल प्रभाव गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।
प्रतिबंध के बावजूद आसानी से उपलब्ध हैं तंबाकू उत्पाद
विशेषज्ञों का कहना है कि तंबाकूयुक्त गुटखा पर प्रतिबंध लागू होने के बावजूद कंपनियों ने तंबाकू और पान मसाला अलग-अलग पैकेट में बेचने की रणनीति अपना ली है। बाजार और दुकानों पर दोनों उत्पाद आसानी से उपलब्ध होने के कारण उपभोक्ता इन्हें मिलाकर उपयोग कर लेते हैं, जिससे प्रतिबंध का उद्देश्य काफी हद तक प्रभावित हो रहा है।
वेंडर लाइसेंसिंग सिस्टम लागू करने की मांग
डॉ. आचार्य ने तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण के लिए ‘वेंडर लाइसेंसिंग सिस्टम’ लागू करने का सुझाव दिया। उनका कहना है कि इस व्यवस्था के माध्यम से तंबाकू बेचने वाले दुकानदारों का रिकॉर्ड रखा जा सकेगा और बिक्री पर निगरानी बढ़ाई जा सकेगी। इससे युवाओं तक तंबाकू उत्पादों की पहुंच को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
जनजागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि तंबाकू से होने वाले कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों को रोकने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। समाज में व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने, स्कूल-कॉलेज स्तर पर स्वास्थ्य शिक्षा को बढ़ावा देने और युवाओं को नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता है।
विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि वे तंबाकू और निकोटिन उत्पादों से दूरी बनाएं तथा अपने परिवार और समाज को भी इसके खतरों के प्रति जागरूक करें, ताकि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के बढ़ते खतरे को रोका जा सके।
