जबलपुर। केंद्र सरकार को प्रस्तुत जल जीवन मिशन की रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया है कि शहर में घरों तक पहुंच रहा 47 प्रतिशत पानी पीने योग्य नहीं है। वहीं, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट में पानी को “अत्यंत दूषित” बताया गया है। इस गंभीर स्थिति की स्वतंत्र और त्वरित जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित करने की मांग उठी है।
इसी मुद्दे पर डॉ. पीजी नाजपांडे और रजत भार्गव ने National Green Tribunal में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि जबलपुर में लगभग 80 प्रतिशत पेयजल पाइपलाइनें नालियों-नालों के बीच से गुजरती हैं, जिससे रिसाव होने पर दूषित जल का मिश्रण सीधे सप्लाई में हो जाता है।
50 साल पुरानी पाइपलाइनें, औसत उम्र 20 साल
याचिका में कहा गया है कि डिस्ट्रीब्यूशन लाइन की औसत आयु करीब 20 वर्ष होती है, जबकि शहर की कई पाइपलाइनें पिछले 50 वर्षों से बदली नहीं गईं। बार-बार होने वाले लीकेज के कारण दूषित जल सप्लाई में मिल रहा है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा है।“डीपीआर तक नहीं बनाया”
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रभात यादव और तरुण रावत ने कहा कि 80% लाइनें नालों से गुजरने के बावजूद न तो उन्हें चिन्हित किया गया और न ही उन्हें बदलने/हटाने के लिए कोई विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार की गई। उन्होंने ट्रिब्यूनल से मांग की है कि तत्काल आदेश जारी कर लीकेज दुरुस्त कराए जाएं और पाइपलाइन बदलाव की कार्ययोजना बनाकर 100% शुद्ध पेयजल सुनिश्चित किया जाए।क्या हो सकती है आगे की कार्रवाई?
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उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन
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लीकेज-प्रवण हिस्सों का सर्वे और मैपिंग
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चरणबद्ध पाइपलाइन प्रतिस्थापन
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जल गुणवत्ता की नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग
