जबलपुर। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) जबलपुर खंडपीठ ने एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। 1998 बैच के तीन राज्य पुलिस अधिकारियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए अधिकरण ने उन्हें अंतरिम राहत प्रदान की है और मामले में यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं।
कैडर रिव्यू में देरी बनी विवाद की जड़
याचिकाकर्ताओं ने अधिकरण के समक्ष दलील दी कि भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में चयन के लिए उनके अभ्यर्थित्व पर विचार किया जाना चाहिए, भले ही वे 56 वर्ष की आयु सीमा पार कर चुके हों। उनका कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा हर पांच वर्ष में किया जाने वाला अनिवार्य कैडर रिव्यू समय पर नहीं किया गया।
याचिका के अनुसार, यह कैडर रिव्यू वर्ष 2018 में होना था, लेकिन इसे चार साल की देरी से 2022 में पूरा किया गया। इस देरी के चलते वे आयु सीमा पार कर गए और चयन प्रक्रिया से बाहर हो गए।
“सरकारी देरी का खामियाजा अधिकारियों को क्यों?”
आवेदकों की ओर से अधिवक्ता पंकज दुबे और अक्षय खंडेलवाल ने पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि प्रशासनिक लापरवाही का नुकसान अधिकारियों को नहीं उठाना चाहिए। उन्होंने इसे सिस्टम की विफलता बताते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की।
कैट ने मांगा जवाब, दी अंतरिम राहत
कैट ने प्रथम दृष्टया मामले को आवेदकों के पक्ष में मानते हुए केंद्र और राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। साथ ही यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए गए हैं, जिसे आवेदकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।
