मध्य प्रदेश में डिजिटल सबूतों की सुरक्षा को लेकर बड़ा कदम, कोर्ट पोर्टल पर सार्वजनिक नहीं होंगे यौन अपराधों के इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य

 





भोपाल। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने डिजिटल साक्ष्यों की सुरक्षा, गोपनीयता और प्रमाणिकता सुनिश्चित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड रूल्स-2026 का ड्राफ्ट तैयार किया है। मंजूरी के लिए यह ड्राफ्ट राज्य सरकार को भेजा गया है। प्रस्तावित नियम लागू होने के बाद यौन अपराधों से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध नहीं होंगे और पीड़ितों की निजता को विशेष संरक्षण मिलेगा।

प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय शुक्ला के अनुसार, केंद्र सरकार की पहल पर देशभर में इस दिशा में काम चल रहा है और मध्य प्रदेश ऐसा ड्राफ्ट तैयार करने वाला देश का पहला राज्य बन सकता है। नए नियमों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की सुरक्षा, गोपनीयता और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी गई है।

डिजिटल सबूतों की बढ़ती संख्या बनी चुनौती

वर्तमान समय में कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), सीसीटीवी फुटेज, वीडियो-ऑडियो रिकॉर्डिंग, बैंक स्टेटमेंट, डिजिटल मनी ट्रेल, ई-मेल और वॉट्सएप चैट्स जैसे डिजिटल रिकॉर्ड जांच और न्यायिक प्रक्रिया के महत्वपूर्ण साक्ष्य बन चुके हैं। इनके बढ़ते उपयोग के कारण साक्ष्यों की सुरक्षा और सत्यापन को लेकर नई चुनौतियां सामने आ रही हैं।

वॉट्सएप चैट और वीडियो पेश करने पर जरूरी नहीं होगा फोन जब्त होना

प्रस्तावित नियमों के तहत यदि किसी मामले में वॉट्सएप चैट, वीडियो या अन्य डिजिटल रिकॉर्ड साक्ष्य के रूप में पेश किए जाते हैं, तो संबंधित मोबाइल या डिवाइस कोर्ट को सौंपा जाएगा। निर्धारित प्रमाण-पत्र के साथ डिजिटल रिकॉर्ड को विशेष पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा और उसे एक यूनिक आईडी प्रदान की जाएगी।

मामले की प्रकृति और आवश्यकता के आधार पर कोर्ट संबंधित डिवाइस वापस करने का निर्णय ले सकेगी। जरूरत पड़ने पर अदालत डिवाइस अपने पास रखने या डेटा हटाने का निर्देश भी दे सकती है।

हर डिजिटल साक्ष्य की बनेगी पैकेज फाइल

डिजिटल रिकॉर्ड अपलोड होते ही उसकी हैश वैल्यू, यूनिक आईडी और अपलोड का समय स्वतः दर्ज होगा। इसके आधार पर एक विशेष पैकेज फाइल तैयार की जाएगी, जिसे न्यायिक प्रक्रिया में आधिकारिक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य माना जाएगा। पक्षकार और उनके वकील इस पैकेज फाइल का सत्यापन भी कर सकेंगे।

छेड़छाड़ होते ही बदल जाएगी हैश वैल्यू

साक्ष्यों से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ रोकने के लिए प्रत्येक डिजिटल रिकॉर्ड को एक यूनिक हैश वैल्यू दी जाएगी। वीडियो, ऑडियो या चैट में मामूली बदलाव होने पर भी यह हैश वैल्यू बदल जाएगी, जिससे तुरंत पता चल सकेगा कि रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की गई है। मूल डेटा की सुरक्षा के लिए बिट-टू-बिट कॉपी यानी मिरर इमेज सिस्टम का भी प्रावधान रहेगा।

ई-सेवा केंद्रों से डाउनलोड कर सकेंगे रिकॉर्ड

पक्षकार और उनके अधिवक्ता जिला न्यायालयों के ई-सेवा केंद्रों या हाई कोर्ट के अधिकृत केंद्रों के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड प्राप्त कर सकेंगे। हालांकि यदि कोई व्यक्ति अनावश्यक डेटा अपलोड कर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास करता है, तो उस पर जुर्माना लगाया जा सकेगा।

यौन अपराधों में नहीं मिलेगी रिकॉर्ड की कॉपी

नए नियमों के तहत यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़िता की पहचान गोपनीय रखने के लिए इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की प्रतिलिपि उपलब्ध नहीं कराई जाएगी। ऐसे संवेदनशील मामलों में अदालत केवल रिकॉर्ड के निरीक्षण की अनुमति दे सकेगी। यह सुविधा केवल संबंधित पक्षकारों और उनके अधिवक्ताओं तक सीमित रहेगी।

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