जबलपुर। एक ओर मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पताल डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर NEET पास कर MBBS की पढ़ाई पूरी करने वाले युवा चिकित्सक नौकरी मिलने का इंतजार कर रहे हैं। अनिवार्य सेवा बॉन्ड और नियुक्ति प्रक्रिया में देरी के कारण कई डॉक्टर महीनों से सरकारी सेवा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। इस स्थिति ने स्वास्थ्य व्यवस्था और चिकित्सा सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार, प्रदेश के कई सरकारी अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद लंबे समय से रिक्त हैं। इसके बावजूद MBBS और पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा कर चुके डॉक्टरों की नियुक्ति प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पा रही है। चिकित्सकों का कहना है कि बॉन्ड से जुड़ी औपचारिकताएं और प्रशासनिक प्रक्रिया में विलंब के कारण वे न तो सरकारी सेवा शुरू कर पा रहे हैं और न ही अपने करियर की अगली योजना बना पा रहे हैं।
चिकित्सकों का कहना है कि उन्होंने कठिन प्रतिस्पर्धा के बाद NEET उत्तीर्ण कर वर्षों की पढ़ाई पूरी की, लेकिन डिग्री मिलने के बाद भी नियुक्ति आदेश का इंतजार करना पड़ रहा है। इससे युवा डॉक्टरों में असमंजस और असंतोष की स्थिति बनी हुई है। उनका कहना है कि यदि समय पर पदस्थापना हो जाए तो ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए केवल मेडिकल सीटें बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया को भी तेज और पारदर्शी बनाना जरूरी है। अस्पतालों में रिक्त पदों और बेरोजगार डॉक्टरों के बीच बना यह विरोधाभास स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने और स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, नियुक्ति और बॉन्ड प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों का समयबद्ध समाधान होने पर ही प्रदेश के अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी दूर होने की उम्मीद है।
