बिना सुनवाई वेतन कटौती और रिकवरी पर हाईकोर्ट सख्त, मेडिकल यूनिवर्सिटी की कार्रवाई पर लगाई रोक

 


जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारियों से वेतन विसंगति के नाम पर की जाने वाली एकतरफा वसूली और वेतन कटौती को लेकर अहम अंतरिम आदेश जारी किया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी कर्मचारी का पक्ष सुने बिना उसके खिलाफ आर्थिक दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति मनीन्दर एस भट्टी की एकलपीठ ने अजय तिवारी बनाम रजिस्ट्रार एवं अन्य मामले में मेडिकल यूनिवर्सिटी द्वारा जारी रिकवरी आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी।

मामले के अनुसार मेडिकल यूनिवर्सिटी में डाटा एंट्री ऑपरेटर के पद पर कार्यरत अजय तिवारी को लंबे समय से नियमानुसार वेतनमान, वेतनवृद्धि और नियमितीकरण का लाभ दिया जा रहा था। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह पूरी प्रक्रिया विश्वविद्यालय प्रशासन और लोकल फंड ऑडिट विभाग की जानकारी और निगरानी में हुई थी। बावजूद इसके वर्षों बाद अचानक विश्वविद्यालय प्रशासन ने लोकल फंड ऑडिट के निर्देशों का हवाला देते हुए वेतन कम करने और वसूली की कार्रवाई शुरू कर दी।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अमित रायजादा ने कोर्ट में दलील दी कि बिना नोटिस दिए, बिना सुनवाई का अवसर प्रदान किए और बिना कर्मचारी का पक्ष जाने वेतन कटौती करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। उन्होंने अदालत को बताया कि 27 फरवरी 2026 को जारी आदेश के जरिए याचिकाकर्ता का वेतनमान कम कर दिया गया, जबकि उसे अपनी बात रखने का कोई मौका तक नहीं दिया गया।

मामले में यह भी सामने आया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने 13 मार्च 2026 को एक और पत्र जारी कर अजय तिवारी को 25 मार्च 2026 तक सीपीसीटी परीक्षा का प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। साथ ही चेतावनी दी गई थी कि निर्धारित समय सीमा में प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं करने पर वित्तीय वसूली की कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। याचिकाकर्ता ने इसे भी अदालत में चुनौती देते हुए कहा कि नियुक्ति और नियमितीकरण नियमों के तहत हुआ था, ऐसे में वर्षों बाद नए आधार पर रिकवरी करना न्यायसंगत नहीं है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया पाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अदालत ने माना कि बिना सुनवाई का अवसर दिए पारित आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता। इसके बाद कोर्ट ने विश्वविद्यालय द्वारा जारी रिकवरी आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए याचिकाकर्ता को बड़ी राहत प्रदान की है।

इस फैसले को सरकारी और अर्द्धशासकीय संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अदालत ने साफ संकेत दिए हैं कि प्रशासनिक कार्रवाई में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी स्वीकार नहीं की जाएगी।

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