डिजिटल रिकॉर्ड की एक गलती ने किसान को बनाया दफ्तरों का चक्करदार, तीन महीने से नाम सुधार के लिए भटक रहा अन्नदाता



जबलपुर। एक ओर सरकार डिजिटल इंडिया और किसानों को तकनीक से जोड़कर सुविधाएं देने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर सरकारी रिकॉर्ड में हुई एक छोटी-सी गलती ने जिले के एक छोटे किसान का जीवन मुश्किलों से भर दिया है। खरीफ सीजन में धान की बुवाई के लिए खाद-बीज जुटाने की चिंता के बीच किसान पिछले तीन महीनों से अपने नाम की त्रुटि सुधारवाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता के कारण अब तक उसकी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।

जिले के नीमखेड़ा क्षेत्र निवासी छोटे किसान संकट मोचन पटेल के नाम लगभग 2.5 एकड़ संयुक्त खातेदारी भूमि दर्ज है। लेकिन विभागीय डिजिटल रिकॉर्ड में उनके सही नाम "संकट मोचन पटेल" की जगह गलती से "शंकर मोचन पटेल" दर्ज हो गया। यही एक त्रुटि अब उनके लिए बड़ी परेशानी का कारण बन गई है।

खरीफ सीजन में खाद-बीज के लिए परेशान किसान

वर्तमान समय में जिलेभर के किसान खरीफ धान की बुवाई की तैयारियों में जुटे हुए हैं। खाद और बीज की मांग बढ़ने से समितियों और दुकानों पर लंबी कतारें लग रही हैं। ऐसे समय में संकट मोचन पटेल किसान आईडी बनवाकर खाद-बीज लेने पहुंचे तो उन्हें पहली बार रिकॉर्ड में दर्ज नाम की गलती का पता चला। गलत नाम दर्ज होने के कारण उनकी किसान आईडी नहीं बन सकी और वे सरकारी योजनाओं का लाभ लेने से भी वंचित हो गए।

पटवारी से एसडीएम और तहसील तक भटकता रहा किसान

समस्या सामने आने के बाद किसान ने सबसे पहले संबंधित पटवारी से संपर्क किया। पटवारी ने इसे विभागीय त्रुटि बताते हुए नाम सुधार के लिए आवेदन करने की सलाह दी। इसके बाद किसान ने अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) कार्यालय में आवेदन प्रस्तुत किया, जहां से मामला तहसीलदार कार्यालय भेज दिया गया।

पटवारी ने जांच कर अपनी रिपोर्ट भी तैयार कर तहसील कार्यालय में प्रस्तुत कर दी, लेकिन जब किसान कार्रवाई की जानकारी लेने पहुंचा तो वहां मौजूद बड़े बाबू ने पटवारी की रिपोर्ट में त्रुटि बताकर नया प्रतिवेदन लाने को कह दिया। इसके बाद से किसान फिर पटवारी और तहसील कार्यालय के बीच चक्कर लगाने को मजबूर है।

डिजिटल व्यवस्था के दावों पर उठे सवाल

यह मामला सरकारी डिजिटल व्यवस्था की खामियों को भी उजागर करता है। एक ओर रिकॉर्ड ऑनलाइन किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यदि उनमें कोई त्रुटि हो जाए तो उसे सुधारने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि किसान महीनों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को विवश हो जाता है। खरीफ सीजन जैसे महत्वपूर्ण समय में नाम की एक गलती के कारण किसान न तो किसान आईडी बनवा पा रहा है और न ही समय पर खाद-बीज प्राप्त कर पा रहा है।

समय रहते समाधान नहीं हुआ तो प्रभावित हो सकती है खेती

संकट मोचन पटेल का कहना है कि यदि जल्द ही उनके नाम की त्रुटि नहीं सुधारी गई तो धान की बुवाई प्रभावित हो सकती है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि विभागीय लापरवाही की जिम्मेदारी तय करते हुए उनका नाम तत्काल सही कराया जाए, ताकि वे समय पर खाद-बीज प्राप्त कर खेती का कार्य शुरू कर सकें।

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